Bishnoi religion (बिश्नोई धर्म)

बिश्नोई संस्कृति
संस्थापक – गुरु जम्भेश्वर भगवान
स्थापना–विक्रम संवत् 1542 (1485ई.)कार्तिक कृष्णा अष्टमी को
प्रमुख मेले–वर्ष में 2 मेलें भरते हैं (फाल्गुन व आश्विन अमावस्या को)
जम्भेश्वर भगवान का परिचय
जन्म–1451 ई. , पींपासर, नागौर
पंवार वंशीय राजपूत कुल में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को
बचपन का नाम–धन्ना,गूंगा गेला संत
मृत्यु–वि. संवत् 1536,लालासर
समाधि–मुकाम,नोखा(बीकानेर)
प्रमुख कार्यस्थल–समराथल(बीकानेर) धोक धोरे के नाम से प्रसिद्ध
जांभोजी की सम्पूर्ण जीवनी
–विष्णु के उपासक एवं विधवा विवाह के समर्थक थे।
–जांभोजी को विश्व का प्रथम पर्यावरण वैज्ञानिक माना जाता है।
ग्रंथ–शब्दवाणी 
मुख से उच्चारित वाणी–शब्दवाणी(गुरुवाणी, जंभवाणी,वेदवाणी)
उपदेश स्थल–साथरी
अन्य तीर्थ स्थल–जांभा, रामड़ावास, जांगलू
जाम्भोजी की शरण में आए विभिन्न सम्राट–सिकंदर लोदी(दिल्ली),महमुद खां (नागौर), सातलदेव (जोधपुर),जेतसिंह(जैसलमेर), राव दूदा (मेड़ता), राणा सांगा (मेवाड़)
प्रमुख ग्रंथ–बिश्नोई धर्म प्रकाश, जम्भसागर,जम्भसंहिता(5वां वेद, 19वां पुराण)
–जांभोजी ने राजस्थान से बाहर प्रमुख रूप से लोदीपुर(उ. प्र.) ,नेपाल,सात समंदर पार एवं अनेक स्थलों पर भ्रमण करके उपदेश दिया व जीवों का उद्धार किया।
–राव लूणकरण तथा सिकंदर लोदी ने जांभोजी से प्रभावित होकर पशु वध पर रोक लगा दी।
–बिश्नोई संप्रदाय को अपनाने वाले पहले व्यक्ति पुल्हजी थे।
–जाम्भोजी के पश्चात बिश्नोई संप्रदाय के मार्गदर्शक विल्होजी बने।
विलहोजी की रचना–कथा जैसल की
बिश्नोई संप्रदाय में पर्यावरण हेतु बलिदान देने वाले व्यक्ति
(1.) कर्मा–गौरा–1604ई., रामसड़ी(जोधपुर)
(2.)विंचोजी–पोलावास (जोधपुर)
(3.)विश्व का सबसे बड़ा पर्यावरण बलिदान व चिपको आंदोलन की शुरुआत अमृतादेवी बिश्नोई के नेतृत्व में सन् 1730 ई. में किया गया , जिसमें 363 लोग शहीद हो गए।
पवित्र वृक्ष–खेजड़ी (बीकानेर के ध्वज में स्थित जिसे माटो कहा जाता है।)
–बिश्नोई धर्म में पर्यावरण रक्षा हेतु दिया गया बलिदान खड़ाना साका कहलाता है।
बिश्नोई संप्रदाय के पूजा स्थल–
–पीपासर ,नागौर जन्म स्थल जहां जांभोजी की खड़ाऊ पूजी जाते हैं।
–रोटू ,नागौर खेजड़ियों का बाग स्थित है जो एक आखेट निषेध क्षेत्र है।
–रामड़ावास जोधपुर विल्होजी जी का मंदिर स्थित है।
–जांबा फलोदी जहां जेतसिंह द्वारा तालाब का निर्माण कराया गया तथा यह बिश्नोई धर्म का पुष्कर कहलाता है,जहां चैत्र व भाद्रपद की अमावस्या को मेला लगता है।
–लालासर साथरी जान जांभोजी का निर्माण स्थल है वर्तमान में यहां महंत राजेंद्रनंद जी एवं सच्चिदानंद जी ने भव्य मंदिर का निर्माण करवाया है।

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